कयूँ खुशी नही रहती

  ज़िंदगी की गलियों में अकेले घूमते हम ज़ेहन में उठते सवालों का जवाब ढूंडते हम सँग चलते हैं इतनों के फिर भी तन्हा ही रेहते हम खुशी के पल आते हैं और चले जाते हैं फुलझडी सी रौशनी कर के दोबारा अंधेरा छोड जाते हैं कयूँ नही रोज़ रोज़ रहता वो खुशी वाला समाँ कयूँ नहीं उदासी आते ही रुख कर लेती कहीं और का क्या ये हमारी फ़ितरत है या दुनिया का दस्तूर हम ही ऐसे जीते हैं या सभी इतने मजबूर Something i wrote long back… just found it while deleting old stuff from my comp…

Disappearing Act…!

Now why does Anks disappear every year around her birthday??? Good question na, last year, I disappeared for a vacation on the day of my b’day (Not the best decision coz I really missed all the calls and sms that my friends sent me) Thankfully the vacation was fun, so that kinda made up for it… The year before I attended a cousin’s wedding (The Big Fat Punjabi Wedding, if you please!) and that trip too was fun… So basically, while Anks has her share of fun on and around her birthday, she leaves her blog all alone and conveniently

कोई नई बात नहीं है!

Blog: सच में, कोई नई बात नहीं है के Anks तुम किसीका birthday भूल जाओ… मगर फिर भी अपने प्रियजनों का birthday तो तुम कभी नही भूलीं… क्या मैं तुम्हारे प्रियजनों में नहीं आता, जो तुम लगातार दो सालों से मेरा birthday भूल रही हो? तुमने कभी सोचा है की मैंने तुम्हारे हर मूड में, हर ख़ुशी में, हर मुश्किल में तुम्हारा साथ दिया है… तुम कई कई हफ्तों तक मुझे छोड़ कर गायब रहतीं थीं, पर मैंने चूँ तक नहीं की… तुम आधी अधूरी कहानियाँ छोड़ कर बैठ जातीं, मगर में चुप चाप इंतज़ार करता, और तुम्हारे आने पर

Uljhan

सभी चाहते हैं मेरा एक हिस्सा उनके लिये, में कब पाऊँ कुछ अपने लिये जीवन है मेरा, किंतु महत्व किसी और का विचार हैं मेरे, परंतु आचार किसी और सा तस्वीर बनाना चाहूँ तो मन के रंग न भर पाऊँ गीत गाना चाहूँ, तो अपनी धुन न रच पाऊँ कैद हूँ मैं, जैसे एक अदृश्य से पिंजरे में मेहंदी हूँ जैसे, जीवन सार्थक है पिसने में तोडना है मुझे, इन बेडियों को अपने पाँव से अर्थ पाना है खुद का, सँसार कि धूप-छाँव में सभी चाहते हैं मेरा एक हिस्सा उनके लिये, में कब पाऊँ कुछ अपने लिये Sabhee chhahte

एक मुट्ठी आसमान

छोटे छोटे टुकडों में बँटा हुआ है,ऐसा लगता है जैसे कटा हुआ है,लंबी लंबी ईमारतों के बीच में,एक मुट्ठी आसमान ही मिला हुआ है। ऊँची उडान भरते देखा नहीं,सदियों से किसी पंछी को,बस पार करते देखा है,एक छोर से दूसरे तक,अपने आसमान के टुकडे को। बादलों का काफिला भी,निकलता है थक थक के,मेरे टुकडे में कभी कभार,नज़र आता है ठहरा हुआ,और फिर चल देता है रुक रुक के। सूरज की क्या बात कहूँ,बस झलक ही दिखलाता है,दिन का एक ही पल है,जो नाम मेरे कर के,आँखों से ओझिल हो जाता है। छोटे छोटे टुकडों में बँटा हुआ है,ऐसा लगता है